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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 5
तस्य प्रियं शिरः कृत्वा मोदो दक्षिणपक्षकः । प्रमोद उत्तरः पक्ष आनन्दो गोष्पदायते ॥
उस (योगी) का प्रिय (ब्रह्म) ही सिर है, 'मोद' उसका दायाँ बाजू, 'प्रमोद' बायाँ बाजू तथा 'आनन्द' उसकी मध्य आत्मा है। उसकी (आत्मा की) स्थिति गाय के पैर के सदृश (चार— प्रिय, मोद, प्रमोद एवं आनन्द रूप) हो जाती है।
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