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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 13
ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये। बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम् ॥
इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति को सिद्धि के लिए सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है। इस तरह से हर एक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होता हुआ सदैव तृप्त होता रहता है।
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