ऐहिकामुष्मिकव्रातसिद्धयै मुक्तेश्च सिद्धये।
बहुकृत्यं पुरा स्यान्मे तत्सर्वमधुना कृतम् ॥
इस लोक एवं परलोक के कृत्यों की सिद्धि के लिए, वैसे ही मुक्ति की सिद्धि के लिए, सर्वप्रथम मुझे बहुत कुछ करना अत्यन्त आवश्यक था; परन्तु अब यह सभी कुछ हो चुका है।
इस प्रकार प्रत्येक योग का मुख्यरूप से अनुसंधान करता हुआ वह अवधूत इसी में कृतकृत्य होकर सदैव तृप्त रहता है।
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