न निरोधो न चोत्पत्तिनं बद्धो न च साधकः।
न मुमुक्षुनं वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥
अतः सत्य बात तो यह है कि किसी का लय(निरोध) नहीं है, किसी की उत्पत्ति नहीं है, कोई आबद्ध(बँधा हुआ) नहीं है, कोई साधक नहीं है, कोई मुमुक्षु(मोक्ष को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाला) नहीं है तथा कोई मुक्त भी नहीं है। यही वास्तविक स्थिति है।
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