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अवधूत • अध्याय 1 • श्लोक 28
देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः। तारं जपतु वाक्तद्वत्पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥
देवताओं की स्तुति-अर्चना, खान, शौच, शिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे। वाणी ॐकार रूपी प्रणव को भले ही जपती रहे, उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे
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