देवताओं की स्तुति-अर्चना, भोजन, शौच, शिक्षा आदि में शरीर भले ही लगा रहे।
वाणीॐकाररूपी प्रणव का भले ही जप करती रहे तथा उपनिषदों का पाठ भले ही होता रहे—
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