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अध्याय 17 — सप्तदश अध्याय

शिवभारतम्
53 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोला - तत्पश्चात् अपने सेना के सेनापति अफजलखान को बुलाकर, अल्लीशाह ने स्वयं समयानुसार उपदेश दिया।
अल्लीशाह बोला - इन सैनिकों के समूह में तू हमारा हित करने वाला है, देव एवं ब्राह्मणों का विरोधी है और मानो तू दूसरा कलिकाल ही हो।
पहले तूने विशाल सेना के साथ प्रस्थान करके राम राजा के वंशी राजाओं को युद्ध में पराजित किया था।
शत्रु को पीड़ा देने वाले तेरे प्रताप के जागृत होने से, श्रीरंगपट्टण का राजा भी रणभूमि से विमुख हो गया है।
जिस प्रकार गरूड़ अत्यन्त क्रोधित सांप को भी अधीन कर लेता है, उसी प्रकार तूने वीरता से आक्रमण करके कर्णपूर के राजा को अपने अधीन किया था।
मंदराचल पर्वत के समान बलशाली तूने, मदुरा शहर को तहस-नहस किया और कांची को अधीन करके सुवर्ण लूट करके लाया।
पग-पग पर यश प्राप्त करने वाले तेरे द्वारा गुलाम बनाया गया वीरभद्र भी छत्रचामर से युक्त ऐश्वर्य को भूल गया है।
सिंहल का राजा, उसी प्रकार उन्मत्त लंका का राजा मेरे से डरते हैं और समुद्र भी मेरी सेवा करता है, यह तेरे पराक्रम का ही परिणाम है।
हे अफजलखान! तेरे चलने पर ये सात कुलपर्वत चलने लगते हैं, समुद्र भी परेशान हो जाता है और सातों द्वीप खिन्न हो जाते हैं।
तेरे पराक्रम को सुनकर क्रोधित हुए दिल्ली के बादशाह को भी रात-दिन नींद नहीं आती है।
ऐसे तेरे जैसे महावीर के जागृत होने पर भी शहाजी का पुत्र शिवाजी, मेरे से रात-दिन द्रोह करता है, यह आश्चर्य है।
अरे! उस महान् उत्साही, स्वाभिमानी, स्वधर्म पर अभिमान करने वाले वीर के द्वारा मुसलमानों के धर्म का नाश हो रहा है।
भयानक जंगली सिंह के समान क्रमानुसार आक्रमण करके यह स्वाभिमानी मेरे शासन को स्वीकार नहीं करता है।
छल-कपट में जिसका चित्त चलायमान है, ऐसे दुष्ट के हाथों में सह्य पर्वत का होना, मेरे मन के लिए असहनीय हो गया है।
मेरे पिता महमूदशाह, यदि इसको नहीं रोकते तो यह दंडाराजपुरी के राजा को समुद्र में डूबा देता।
पुत्र एवं मन्त्रियों के साथ चंद्रराव मोरे को जीतकर इसने बिना किसी प्रतिबंध के जयवल्ली को अधीन कर लिया।
सन्धि करने की इच्छा से मैंने जो औरंगजेब को दुर्ग, अरण्य एवं पर्वतों से युक्त प्रदेश दिये थे, वे प्रदेश उस प्रतापी, वशी एवं उन्मत्त शिवाजी ने मेरा एवं उन मुसलमानों का तिरस्कार करके बलपूर्वक अधीन कर लिये।
यह लुटेरा एवं बागी शिवाजी अचानक छापेमारी करके मेरे शहर गांव एवं कस्बों को लूट लेता है।
एक अहोरात्र में, एक पक्ष में, या एक महीने में पार करने योग्य मार्गों को, वह निर्भय शिवाजी एक क्षण में ही पार कर लेता है।
उग्र पराक्रमी और अपने कपटी स्वभाव से जागरूक शिवाजी, कौमार अवस्था से ही यवनों का अपमान करते आया है।
इस अत्यन्त पराक्रमी शिवाजी ने मुगलों के शहरों पर आक्रमण करके अहमदनगर आदि शहरों पर भयंकर शासन किया है।
प्रयत्नपूर्वक अधीन किये गए निजामशाह के राज्य की स्थिरता भी दिल्ली के बादशाह को इसके भय से संदेह युक्त प्रतीत होती है।
पहले मेरे दादाजी द्वारा पालित-पोषित उसके पिता शहाजी भी उस अविनीत पुत्र को दण्ड देने में असमर्थ है।
मेरे प्रतापी पिता ने छापेमारी करके कैद किए गए शहाजी राजा को इस महाबाहु ने अपने बल से ही मुक्त किया।
यह अल्पायु वाला होते हुए भी शत्रु के भय से भयभीत नहीं होता है, और यह आश्चर्यजनक पराक्रमी हम पर ही आक्रमण करता है।
प्रतिदिन प्रताप एवं संपत्ति के द्वारा इसके वृद्धि को प्राप्त होने से धन के इच्छुक राजा इसकी अधीनता स्वीकार कर रहे हैं।
यह बलवान् शिवाजी धीरे-धीरे पग को आगे बढ़ाते हुए क्या हमारे राज्य को भी छीनकर आत्मसात करेगा?
पहले जिन-जिन वीरों को, इसको जीतने के लिए बारंबार भेजा था। वे वीर इस प्रतापी को प्राप्त करके पुनः वापिस नहीं आयें।
वीर शत्रुओं का नाश करने वाला एवं निर्भय तेरे बिना, उसका जीतने वाला मुझे दूसरा कोई दिखाई नहीं देता है।
इसलिए तू ही जाकर दुर्ग का आश्रय लेकर रहने वाले उस दुर्जय शिवाजी को मूर्तिमत ग्रह की तरह जीवित पकड़कर ले आ।
कवीन्द्र बोला - इस प्रकार अत्यन्त विश्वास के साथ अभिमानी अल्लीशाह के बोलने पर, अफजलखान प्रसन्न होकर वर्तमान कार्य के संबंध में बोला।
अफजलखान बोला - विश्वास एवं प्रेमपूर्वक जो स्वामी आज्ञा देता है, उसका कर्ता तो स्वामी ही होता है, सेवक केवल निमित्तमात्र है।
शत्रुओं के नाश करने की जो शक्ति मेरे में जागृत अवस्था में विद्यमान है, उसको आज आपने मुझे कार्य बताकर उसको जागृत किया।
उस पर भयंकर युद्ध करने के लिए तुमने जो मुझे भेजा है, मानो आपने मेरे पर अनुग्रह करके अपना बनाया हो।
यदि स्वामी सेवक को कार्य आदेशित नहीं करेगा तो उसमें पराक्रम है या नहीं, उसको कौन जानेगा?
अहर्निश स्पर्धा करने वाले एवं यमराज के समान दुष्ट ऐसे उस शिवाजी को सुदृढता से बांधकर आपके समक्ष लाऊंगा।
कर्नाटक राज्य में प्रवेश करके मैंने सैंकड़ों राजाओं को जीता है, वह मेरा विजय है, किन्तु यदि मैंने शिवाजी को नहीं जीता तो मेरा जीवन जीना निरर्थक है।
कवीन्द्र बोला - इस प्रकार बोलने वाले, अपने प्रचण्ड शक्ति पर अभिमान करने वाले और स्वीकृत कार्य को शीघ्र करने के लिए उद्यत, ऐसे अफजलखान को वहां प्रेषित करने के लिए उत्सुक आदिलशाह ने उस समय अत्यन्त उपहारों को देकर उसका सत्कार किया।
तत्पश्चात् रत्नों से परिपूर्ण काठी वाले ऊंट एवं घोड़े, उसी प्रकार अलंकारों से युक्त भद्र जाति के हाथी, अनेक प्रकार के कवच, मुकुट एवं शस्त्र और विचित्र वस्त्र, स्वयं की बिरुंदे, विमानों को भी तिरस्कृत करने वाली अनेक प्रकार की पालकियां, चांदी एवं सोने के पलंग, पान एवं सुपारी के बक्से, रत्नों के शिरोभूषण मोतियों की माला, हीरे के बाजूबंद, कड़े अनेक रंगीन रत्नजडित अंगुठियां, उसी प्रकार दूसरे देशों में होने वाले विभिन्न जातियों के अनेक उत्कृष्ट पदार्थ और अरबों का खजाना अल्लीशाह से अफजलखान को मिला।
वन की तीक्ष्णता के समान पैनी, रत्नजडित म्यान में रखी हुई, अपने हाथ में स्थित स्वयं की कटार अल्लीशाह को दी।
फिर स्वामी ने ही प्रेमपूर्वक उसके कमर के पट्टे में लटकाई हुई, रत्नजडित म्यान में स्थित एवं आभूषणों से युक्त कटार को धारण किया।
तत्पश्चात्, प्रस्थान का समयोचित उसको बारंबार प्रेमपूर्वक मुजरा करके वह पर्वत के समान अफजलखान चलने लगा।
बारंबार मुजरा करने वाले एवं प्रस्थान किये हुए उस अफजलखान पर पग-पग पर कृपादृष्टि डालकर स्वामी ने कृपा की।
उस महत्वाकांक्षी आदिलशाह ने उस वीरमान्य अफजलखान को सेनापति बनाकर, दूसरे सेनानायक को भी उसकी सहायता करने का आदेश दिया।
शबर राक्षस के समान अंबर और प्रतापी याकुत, अभिमानी मुसेखान, हसन पठाण, रणदुल्लाखान का रणदुल्ला नामक पुत्र निरंकुश हाथी के समान अंकुशखान भी, खेलकर्ण का खरीदा गया पुत्र बर्बर और शत्रुरूपी वृक्षों के लिए हाथी के समान महाबाहु हिलाल और सेना से एवं मित्रों के समुदाय से युक्त दूसरे मुसलमान शीघ्र ही स्वामी की आज्ञा से उस सेनापति के पीछे गये।
जिसने बलपूर्वक अनेक शत्रुओं को जीता है, ऐसा युद्ध में निपुण, भयंकर कार्य का कर्ता, घोरपड़े भी उसके पीछे पड़ गया। पांढरे नाईक, खराटे नाईक, अनेक सैनिकों का नायक कल्याण यादव, जिसके युद्ध का आवेश प्रचंड है ऐसा मंबाजी भोसले, जगत् प्रसिद्ध पराक्रम के कर्त्ता घांटगे एवं कांटे और दूसरे राजा एवं हजारों सामन्त चतुरंगिनी सेना के साथ उस सेनापति के पीछे गये।
तत्पश्चात् ज्योतिषी द्वारा कथित मुहूर्त पर प्रस्थान किये हुए उसको अशुभसूचक अनेक चिह्न दिखाई दिये।
पंखों को फड़फड़ाकर उच्चध्वनि करने वाले एवं बाई तरफ से जाने वाले कौवों ने उसका साहस बेकार है, ऐसा बताया, मध्याह्न में ही सूर्य अस्पष्ट दिखने लगा, अन्तरिक्ष मानों प्रज्ज्वलित हो गया हो, दिशाएं मलिन हो गई, एक बड़ी उल्का आकाश से अचानक गिर गई, बादलों के बिना ही आकाश में आकाशीय विद्युत गरजने लगी। पूर्व दिशा में लोमड़ियां भयंकर आवाज करने लगी, ध्वज टूट गया और यान खराब हो गये, कंकड, धूल की वर्षा करने वाली वायु विपरीत बहने लगी, सेना का अग्रिम हांथी अंकुश के प्रहार के बिना ही आगे दौड़ने लगा।
इस प्रकार के एवं अन्य निमित्तों के द्वारा उसके मार्ग को रोकने पर भी उसने इन्द्र के समान युद्ध के उत्साह को नहीं छोड़ा।
फिर बिजापुर से प्रस्थान किये हुए उस अफजलखान ने आधे योजन पर अपना निवासस्थान बनाया।
वहां चारों ओर से आई हुई सेनाओं से युक्त यह निवासस्थान बनाने के लिए उत्सुक सेनासमूह समुद्र के समान प्रतीत हुआ।
नवीन कपड़ों के खड़े किये गए खंभों से सुशोभित मण्डप की उंचाई से आकाश को दकने वाले तंबुओं से वह सेना सुशोभित थी। अनेक रंगों से रंगीन बैठकें सभामण्डप के अंदर फैली हुई थी, पसंदीदा अनेक वस्तुओं से निर्मित समुहों से वह सुशोभित था, उंचे छतों की छाया से उसके अंदर का प्रांगण शोभायमान था, समीप ही अग्रभाग पर घोड़े बंधे हुए थे, मदमस्त हाथियों के समूह के गर्जन से दिशाएं परिपूर्ण हो गई थी, अहर्निश रक्षा करने वाले बंदूकधारी, धनुर्धारी, ढाल एवं तलवारों को धारण करने वाले, अनगिनत परशुधारी, भाला धारण करने वाले, ऐसे अनेक व्यक्ति आस-पास खड़े होकर उसकी आठों दिशाओं से रक्षा कर रहे थे, अनेक नगाड़ों एवं प्रचंड वाद्यों की ध्वनि से वह भयंकर प्रतीत हो रहा था, अनेक प्रकार के कार्यों में व्यक्त कारीगरों के कोलाहल से वह व्याप्त हो गया, अपने योग्य स्थान पर रहने वाले सभी लोग आनन्दित थे, इस प्रकार की सेना को सेनापति ने गर्व के साथ देखा।
युद्ध में अभिमानी, स्वामी से अत्यधिक सम्मान प्राप्त किया हुआ। शौर्य एवं लक्ष्मी से शोभायमान, भोसले राजे को शीघ्र जीतने का इच्छुक, दुर्भाग्य से वापिस लौटाया गया वह अफजलखान पग-पग पर खराब निमित्तों को देखता हुआ और अंतकरण में बड़े कपट को छुपाकर वैराट प्रांत को शीघ्र प्राप्त हो गया।
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