ततः पुनः पुनस्तस्मै प्रीत्या प्रास्थानकालिकीः । कृत्वा नतीरफजलः प्रचचालाचलोपमः ।।
तत्पश्चात्, प्रस्थान का समयोचित उसको बारंबार प्रेमपूर्वक मुजरा करके वह पर्वत के समान अफजलखान चलने लगा।
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