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शिवभारतम् • अध्याय 17 • श्लोक 39
ततः सरत्नपर्याणपृष्ठानुष्ट्रांस्तुरङ्गमान्। तथैवाभरणोपेतान् भद्रजातीन्मत‌ङ्गजान् ।।४१ तनुत्राणि शिरखाणि शस्त्राणि विविधानि च। विचित्राणि च वस्त्राणि निजानि बिरुदानि च ।। तिरस्कृतविमानानि याप्ययानान्यनेकधा। रौप्यान् रौक्मांश्च पर्य‌ङ्कान् करङकांश्च पत‌ग्रहान्।। रत्नोत्तंसानथोमुक्तास्रजोहीराङ्‌ङ्गदानि च। कटकान्यूर्मिकाश्चापि चित्ररत्नचयांकिताः ।। तथा द्वीपान्तरोत्थानि जातिश्रेष्ठान्यनेकशः । अल्लीशाहादफजलः प्रापत्कोषांच काटिशः ।।
तत्पश्चात् रत्नों से परिपूर्ण काठी वाले ऊंट एवं घोड़े, उसी प्रकार अलंकारों से युक्त भद्र जाति के हाथी, अनेक प्रकार के कवच, मुकुट एवं शस्त्र और विचित्र वस्त्र, स्वयं की बिरुंदे, विमानों को भी तिरस्कृत करने वाली अनेक प्रकार की पालकियां, चांदी एवं सोने के पलंग, पान एवं सुपारी के बक्से, रत्नों के शिरोभूषण मोतियों की माला, हीरे के बाजूबंद, कड़े अनेक रंगीन रत्नजडित अंगुठियां, उसी प्रकार दूसरे देशों में होने वाले विभिन्न जातियों के अनेक उत्कृष्ट पदार्थ और अरबों का खजाना अल्लीशाह से अफजलखान को मिला।
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