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शिवभारतम् • अध्याय 17 • श्लोक 48
स पक्षपातं क्रोशन्तः प्रकामं वामगामिनः। वृधेति कथयामासुर्वायसास्तस्य साहसम् ।। बत भेजे दिनार्थेऽपि भानुरस्पष्टभानुताम्। प्रजज्वालेवान्तरिक्षं बभूवुर्भूसरा दिशः ।। सहसैव महत्युल्का निपपात दिवस्तटात्। धनं विनैव च व्योम्न बभूवाशनिनिस्वनः ।। ववाशिरे प्रतिभयं दिशमैन्द्रीं श्रिताः शिवाः। भङ्गमाप ध्वजो यानान्यप्रहृष्टानि चाभवन्।। अवाप सदृशद्रेणु वर्षीवातः प्रतीपताम्। बभ्रामाग्रे प्रणुन्नोऽपि वारणः पृतनाग्रणीः ।॥
पंखों को फड़फड़ाकर उच्चध्वनि करने वाले एवं बाई तरफ से जाने वाले कौवों ने उसका साहस बेकार है, ऐसा बताया, मध्याह्न में ही सूर्य अस्पष्ट दिखने लगा, अन्तरिक्ष मानों प्रज्ज्वलित हो गया हो, दिशाएं मलिन हो गई, एक बड़ी उल्का आकाश से अचानक गिर गई, बादलों के बिना ही आकाश में आकाशीय विद्युत गरजने लगी। पूर्व दिशा में लोमड़ियां भयंकर आवाज करने लगी, ध्वज टूट गया और यान खराब हो गये, कंकड, धूल की वर्षा करने वाली वायु विपरीत बहने लगी, सेना का अग्रिम हांथी अंकुश के प्रहार के बिना ही आगे दौड़ने लगा।
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