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शिवभारतम् • अध्याय 17 • श्लोक 14
छलप्रचलचित्तस्य खलस्यास्य समाश्रयात्। मम चित्ते चिरं शैलः सह्यो ऽप्यसह्यताम् ।।
छल-कपट में जिसका चित्त चलायमान है, ऐसे दुष्ट के हाथों में सह्य पर्वत का होना, मेरे मन के लिए असहनीय हो गया है।
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