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शिवभारतम् • अध्याय 17 • श्लोक 52
महार्हवर्णैरुच्छ्रायच्छादितव्योममण्डलैः । नवैरुत्तम्भितस्तम्भैर्मण्डितं पटमण्डपैः ॥ प्रोल्लसत्काण्डपटकप्राकारमयमण्डपम् । विचित्रासनविस्तारप्रस्तारितसभान्तरम् ॥ पुञ्जीकृतेष्टभूयिष्ठवस्तुसम्भारभासुरम् । उच्चैरुत्तानितोल्लात्र प्रच्छायाञ्चितचत्वरम् ॥ अविदूर पुरोदेशद्वयीनद्धतुरङ्गमम् । समदद्विदव्यूहबृहितस्पृष्टदिक्तटम् ।। जागरूकैरहोरात्रं गुटिकायन्त्रधारिभिः । कोदण्डिभिस्तथान्यैश्च खड्गखेटकपाणिभिः ॥ अपारैश्च तथा पारश्वधिकैः शक्तिहेतिकैः । अभिगुप्ताष्टदिग्भागमभितस्थितिशालिभिः ॥ तदनेकानकोदग्रवाद्यनिर्घोषभीषणम् । तत्तत्कार्यविधिव्यग्रजनकोलाहलाकुलम् ॥ यथास्थानस्थिताशेषजनलब्धसुखोदयम् । सैन्यं सैन्यपतिः सर्वे गुरुगर्वं व्यलोकत ॥
नवीन कपड़ों के खड़े किये गए खंभों से सुशोभित मण्डप की उंचाई से आकाश को दकने वाले तंबुओं से वह सेना सुशोभित थी। अनेक रंगों से रंगीन बैठकें सभामण्डप के अंदर फैली हुई थी, पसंदीदा अनेक वस्तुओं से निर्मित समुहों से वह सुशोभित था, उंचे छतों की छाया से उसके अंदर का प्रांगण शोभायमान था, समीप ही अग्रभाग पर घोड़े बंधे हुए थे, मदमस्त हाथियों के समूह के गर्जन से दिशाएं परिपूर्ण हो गई थी, अहर्निश रक्षा करने वाले बंदूकधारी, धनुर्धारी, ढाल एवं तलवारों को धारण करने वाले, अनगिनत परशुधारी, भाला धारण करने वाले, ऐसे अनेक व्यक्ति आस-पास खड़े होकर उसकी आठों दिशाओं से रक्षा कर रहे थे, अनेक नगाड़ों एवं प्रचंड वाद्यों की ध्वनि से वह भयंकर प्रतीत हो रहा था, अनेक प्रकार के कार्यों में व्यक्त कारीगरों के कोलाहल से वह व्याप्त हो गया, अपने योग्य स्थान पर रहने वाले सभी लोग आनन्दित थे, इस प्रकार की सेना को सेनापति ने गर्व के साथ देखा।
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