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शिवभारतम् • अध्याय 17 • श्लोक 53
संग्रामे साभिमानः स भृशमफजलः स्वामिनो लब्धमानः । शौर्यश्रीशोभमानः सपदि भृशबलं भूपर्ति जेतुकामः । दुर्दैवाकृष्टवित्तः पथि पथि परितो दुर्निमित्तानि पश्यन् । वैराटं राष्ट्रमन्तर्गतगुरुनिकृतिः क्षिप्रमभ्याससाद ॥ इत्यनुपुराणे सूर्यवंशे निधिवासकरपरमानन्दकवीन्द्र प्रकाशितायां शतसाहस्यां संहितायां अफजलाभ्यागमो नाम सप्तदशोऽध्यायः ॥
युद्ध में अभिमानी, स्वामी से अत्यधिक सम्मान प्राप्त किया हुआ। शौर्य एवं लक्ष्मी से शोभायमान, भोसले राजे को शीघ्र जीतने का इच्छुक, दुर्भाग्य से वापिस लौटाया गया वह अफजलखान पग-पग पर खराब निमित्तों को देखता हुआ और अंतकरण में बड़े कपट को छुपाकर वैराट प्रांत को शीघ्र प्राप्त हो गया।
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