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अध्याय 1 — पुत्रगीता

पुत्रगीता
40 श्लोक • केवल अनुवाद
राजा युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! समस्त भूतों का संहार करने वाला यह काल बराबर बीता जा रहा है, ऐसी अवस्था में मनुष्य क्या करने से कल्याण का भागी हो सकता है? यह मुझे बताइये।
भीष्मजी ने कहा - युधिष्ठिर! इस विषय में ज्ञानी पुरुष पिता और पुत्र के संवादरूप इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं। तुम उस संवाद को ध्यान देकर सुनो।
कुन्तीकुमार! प्राचीन काल में एक ब्राह्मण थे, जो सदा वेद-शास्त्रों के स्वाध्याय में तत्पर रहते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो गुण से तो मेधावी था ही, नाम से भी मेधावी था।
वह मोक्ष, धर्म और अर्थ में कुशल तथा लोकतत्त्व का अच्छा ज्ञाता था। एक दिन उस पुत्र ने अपने स्वाध्यायपरायण पिता से कहा-
पुत्र बोला - पिताजी! मनुष्यों की आयु तीव्र गति से बीती जा रही है। यह जानते हुए धीर पुरुष को क्या करना चाहिये? तात! आप मुझे उस यथार्थ उपाय का उपदेश कीजिये, जिसके अनुसार मैं धर्म का आचरण कर सकूँ।
पिता ने कहा - बेटा! द्विज को चाहिये कि वह पहले ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करे; फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके पितरों की सद्गति के लिये पुत्र पैदा करने की इच्छा करे। विधिपूर्वक त्रिविध अग्नियों की स्थापना करके यज्ञों का अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश करे। उसके बाद मौनभाव से रहते हुए संन्यासी होने की इच्छा करे।
पुत्र ने कहा - पिताजी! यह लोक जब इस प्रकार से मृत्यु द्वारा मारा जा रहा है, जरा-अवस्था द्वारा चारों ओर से घेर लिया गया है, दिन और रात सफलतापूर्वक आयुक्षयरूप काम करके बीत रहे हैं - ऐसी दशा में भी आप धीर की भाँति कैसी बात कर रहे हैं?
पिता ने पूछा - बेटा! तुम मुझे भयभीत-सा क्यों कर रहे हो? बताओ तो सही, यह लोक किससे मारा जा रहा है, किसने इसे घेर रखा है और यहाँ कौन-से ऐसे व्यक्ति हैं, जो सफलतापूर्वक अपना काम करके व्यतीत हो रहे हैं?
पुत्र ने कहा - पिताजी! देखिये, यह सम्पूर्ण जगत् मृत्यु के द्वारा मारा जा रहा है। बुढ़ापे ने इसे चारों ओर से घेर लिया है और ये दिन-रात ही वे व्यक्ति हैं, जो सफलतापूर्वक प्राणियों की आयु का अपहरणस्वरूप अपना काम करके व्यतीत हो रहे हैं, इस बात को आप समझते क्यों नहीं हैं?
ये अमोघ रात्रियाँ नित्य आती हैं और चली जाती हैं। जब मैं इस बात को जानता हूँ कि मृत्यु क्षणभर के लिये भी रुक नहीं सकती और मैं उसके जाल में फँसकर ही विचर रहा हूँ, तब मैं थोड़ी देर भी प्रतीक्षा कैसे कर सकता हूँ?
जब एक-एक रात बीतने के साथ ही आयु बहुत कम होती चली जा रही है, तब छिछले जल में रहने वाली मछली के समान कौन सुख पा सकता है?
जिस रात के बीतने पर मनुष्य कोई शुभ कर्म न करे, उस दिन को विद्वान् पुरुष 'व्यर्थ ही गया' समझे। मनुष्य की कामनाएँ पूरी भी नहीं होने पातीं कि मौत उसके पास आ पहुँचती है।
जैसे घास चरते हुए भेड़े के पास अचानक व्याघ्री पहुँच जाती है और उसे दबोचकर चल देती है, उसी प्रकार मनुष्य का मन जब दूसरी ओर लगा होता है, उसी समय सहसा मृत्यु आ जाती है और उसे लेकर चल देती है।
इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये। आपका यह समय हाथ से निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे ही पड़े रह जायेंगे और मौत आपको खींच ले जायगी।
कल किया जाने वाला काम आज ही पूरा कर लेना चाहिये। जिसे सायंकाल में करना है, उसे प्रातःकाल में ही कर लेना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम अभी पूरा हुआ या नहीं।
कौन जानता है कि किसका मृत्युकाल आज ही उपस्थित होगा? सम्पूर्ण जगत्पर प्रभुत्व रखने वाली मृत्यु जब किसी को हरकर ले जाना चाहती है तो उसे पहले से निमन्त्रण नहीं भेजती है। जैसे मछेरे चुपके से आकर मछलियों को पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार मृत्यु भी अज्ञात रहकर ही आक्रमण करती है।
अतः युवावस्था में ही सबको धर्म का आचरण करना चाहिये; क्योंकि जीवन निःसन्देह अनित्य है। धर्माचरण करने से इस लोक में मनुष्य की कीर्ति का विस्तार होता है और परलोक में भी उसे सुख मिलता है।
जो मनुष्य मोह में डूबा हुआ है, वही पुत्र और स्त्री के लिये उद्योग करने लगता है और करने तथा न करने योग्य काम करके इन सबका पालन-पोषण करता है।
जैसे सोये हुए मृग को बाघ उठा ले जाता है, उसी प्रकार पुत्र और पशुओं से सम्पन्न एवं उन्हीं में मन को फँसाये रखने वाले मनुष्य को एक दिन मृत्यु आकर उठा ले जाती है।
जब तक मनुष्य भोगों से तृप्त नहीं होता, संग्रह ही करता रहता है, तभी तक ही उसे मौत आकर ले जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे व्याघ्र किसी पशु को ले जाता है।
मनुष्य सोचता है कि यह काम पूरा हो गया, यह अभी करना है और यह अधूरा ही पड़ा है; इस प्रकार चेष्टाजनित सुख में आसक्त हुए मानव को काल अपने वश में कर लेता है।
मनुष्य अपने खेत, दूकान और घर में ही फँसा रहता है, उसके किये हुए उन कर्मों का फल मिलने भी नहीं पाता, उसके पहले ही उस कर्मासक्त मनुष्य को मृत्यु उठा ले जाती है।
कोई दुर्बल हो या बलवान्, शूरवीर हो या डरपोक तथा मूर्ख हो या विद्वान्, मृत्यु उसकी समस्त कामनाओं के पूर्ण होने से पहले ही उसे उठा ले जाती है।
पिताजी! जब इस शरीर में मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणों से होने वाले दुःखों का आक्रमण होता ही रहता है, तब आप स्वस्थ-से होकर क्यों बैठे हैं?
देहधारी जीव के जन्म लेते ही अन्त करने के लिये मौत और बुढ़ापा उसके पीछे लग जाते हैं। ये समस्त चराचर प्राणी इन दोनों से बँधे हुए हैं।
ग्राम या नगर में रहकर जो स्त्री-पुत्र आदि में आसक्ति बढ़ायी जाती है, यह मृत्यु का मुख ही है और जो वन का आश्रय लेता है, यह इन्द्रियरूपी गौओं को बाँधने के लिये गोशाला के समान है, यह श्रुति का कथन है।
ग्राम में रहने पर वहाँ के स्त्री-पुत्र आदि विषयों में जो आसक्ति होती है, यह जीव को बाँधने वाली रस्सी के समान है। पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं। पापी पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं।
जो मनुष्य मन, वाणी और शरीररूपी साधनों द्वारा प्राणियों की हिंसा नहीं करता, उसकी भी जीवन और अर्थ का नाश करने वाले हिंसक प्राणी हिंसा नहीं करते हैं।
सत्य के बिना कोई भी मनुष्य सामने आते हुए मृत्यु की सेना का कभी सामना नहीं कर सकता; इसलिये असत्य को त्याग देना चाहिये; क्योंकि अमृतत्व सत्य में ही स्थित है।
अतः मनुष्य को सत्यव्रत का आचरण करना चाहिये। सत्ययोग में तत्पर रहना और शास्त्र की बातों को सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियों का संयम करना चाहिये। इस प्रकार सत्य के द्वारा ही मनुष्य मृत्यु पर विजय पा सकता है।
अमृत और मृत्यु दोनों इस शरीर में ही स्थित हैं। मनुष्य मोह से मृत्यु को और सत्य से अमृत को प्राप्त होता है।
अतः अब मैं हिंसा से दूर रहकर सत्य की खोज करूँगा, काम और क्रोध को हृदय से निकालकर दुःख और सुख में समान भाव रखूँगा तथा सबके लिये कल्याणकारी बनकर देवताओं के समान मृत्यु के भय से मुक्त हो जाऊँगा।
मैं निवृत्तिपरायण होकर शान्तिमय यज्ञ में तत्पर रहूँगा, मन और इन्द्रियों को वश में रखकर ब्रह्मयज्ञ (वेद-शास्त्रों के स्वाध्याय) में लग जाऊँगा और मुनिवृत्ति से रहूँगा। उत्तरायण के मार्ग से जाने के लिये मैं जप और स्वाध्यायरूप वाग्यज्ञ, ध्यानरूप मनोयज्ञ और अग्निहोत्र एवं गुरुशुश्रूषादिरूप कर्मयज्ञ का अनुष्ठान करूँगा।
मेरे-जैसा विद्वान् पुरुष नश्वर फल देने वाले हिंसायुक्त पशुयज्ञ और पिशाचों के समान अपने शरीर के ही रक्त-मांसद्वारा किये जाने वाले तामस यज्ञों का अनुष्ठान कैसे कर सकता है?
जिसकी वाणी और मन दोनों सदा भलीभाँति एकाग्र रहते हैं तथा जो त्याग, तपस्या और सत्य से सम्पन्न होता है, वह निश्चय ही सब कुछ प्राप्त कर सकता है।
संसार में विद्या (ज्ञान) के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्य के समान कोई तप नहीं है, राग के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है।
मैं सन्तानरहित होने पर भी परमात्मा में ही परमात्मा द्वारा उत्पन्न हुआ हूँ, परमात्मा में ही स्थित हूँ। आगे भी आत्मा में ही लीन होऊँगा। सन्तान मुझे पार नहीं उतारेगी।
परमात्मा के साथ एकता तथा समता, सत्यभाषण, सदाचार, ब्रह्मनिष्ठा, दण्ड का परित्याग (अहिंसा), सरलता तथा सब प्रकार के सकाम कर्मों से उपरति - इनके समान ब्राह्मण के लिये दूसरा कोई धन नहीं है।
ब्राह्मणदेव पिताजी! जब आप एक दिन मर ही जायँगे तो आपको इस धन से क्या लेना है अथवा भाई-बन्धुओं से आपका क्या काम है तथा स्त्री आदि से आपका कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होने वाला है? आप अपने हृदयरूपी गुफा में स्थित हुए परमात्मा को खोजिये। सोचिये तो सही, आपके पिता और पितामह कहाँ चले गये?
भीष्मजी कहते हैं - नरेश्वर! पुत्र का यह वचन सुनकर पिता ने जैसे सत्य-धर्म का अनुष्ठान किया था, उसी प्रकार तुम भी सत्य-धर्म में तत्पर रहकर यथायोग्य बर्ताव करो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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