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पुत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 38
नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वितम् यथैकता समता सत्यता च । शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः ॥
परमात्मा के साथ एकता तथा समता, सत्यभाषण, सदाचार, ब्रह्मनिष्ठा, दण्ड का परित्याग (अहिंसा), सरलता तथा सब प्रकार के सकाम कर्मों से उपरति - इनके समान ब्राह्मण के लिये दूसरा कोई धन नहीं है।
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