पिता ने कहा - बेटा! द्विज को चाहिये कि वह पहले ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन करे; फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके पितरों की सद्गति के लिये पुत्र पैदा करने की इच्छा करे। विधिपूर्वक त्रिविध अग्नियों की स्थापना करके यज्ञों का अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् वानप्रस्थ-आश्रम में प्रवेश करे। उसके बाद मौनभाव से रहते हुए संन्यासी होने की इच्छा करे।
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