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पुत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 17
युवैव धर्मशीलः स्यादनित्यं खलु जीवितम् । कृते धर्मे भवेत् कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम् ॥
अतः युवावस्था में ही सबको धर्म का आचरण करना चाहिये; क्योंकि जीवन निःसन्देह अनित्य है। धर्माचरण करने से इस लोक में मनुष्य की कीर्ति का विस्तार होता है और परलोक में भी उसे सुख मिलता है।
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