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पुत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
पुत्र उवाच- धीरः किंस्वित् तात कुर्यात् प्रजानन् क्षिप्रं ह्यायुर्भश्यते मानवानाम् । पितस्तदाचक्ष्व यथार्थयोगं ममानुपूर्व्या येन धर्म चरेयम् ॥
पुत्र बोला - पिताजी! मनुष्यों की आयु तीव्र गति से बीती जा रही है। यह जानते हुए धीर पुरुष को क्या करना चाहिये? तात! आप मुझे उस यथार्थ उपाय का उपदेश कीजिये, जिसके अनुसार मैं धर्म का आचरण कर सकूँ।
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