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पुत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 34
पशुयज्ञैः कथं हिंस्त्रैर्मादृशो यष्टुमर्हति । अन्तवद्भिरिव प्राज्ञः क्षेत्रयज्ञैः पिशाचवत् ॥
मेरे-जैसा विद्वान् पुरुष नश्वर फल देने वाले हिंसायुक्त पशुयज्ञ और पिशाचों के समान अपने शरीर के ही रक्त-मांसद्वारा किये जाने वाले तामस यज्ञों का अनुष्ठान कैसे कर सकता है?
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