जब तक मनुष्य भोगों से तृप्त नहीं होता, संग्रह ही करता रहता है, तभी तक ही उसे मौत आकर ले जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे व्याघ्र किसी पशु को ले जाता है।
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