को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति।
(न मृत्युरामन्त्रयते हर्तुकामो जगत्प्रभुः ।)
अबुद्ध एवाक्रमते मीनान् मीनग्रहो यथा ॥
कौन जानता है कि किसका मृत्युकाल आज ही उपस्थित होगा? सम्पूर्ण जगत्पर प्रभुत्व रखने वाली मृत्यु जब किसी को हरकर ले जाना चाहती है तो उसे पहले से निमन्त्रण नहीं भेजती है। जैसे मछेरे चुपके से आकर मछलियों को पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार मृत्यु भी अज्ञात रहकर ही आक्रमण करती है।
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