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पुत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 11
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा। गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा ॥
जब एक-एक रात बीतने के साथ ही आयु बहुत कम होती चली जा रही है, तब छिछले जल में रहने वाली मछली के समान कौन सुख पा सकता है?
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