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पुत्रगीता • अध्याय 1 • श्लोक 32
सोऽहं ह्यहिंस्त्रः सत्यार्थी कामक्रोधबहिष्कृतः । समदुःखसुखः क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमर्त्यवत् ॥
अतः अब मैं हिंसा से दूर रहकर सत्य की खोज करूँगा, काम और क्रोध को हृदय से निकालकर दुःख और सुख में समान भाव रखूँगा तथा सबके लिये कल्याणकारी बनकर देवताओं के समान मृत्यु के भय से मुक्त हो जाऊँगा।
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