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अध्याय 79 — अथ शय्यालक्षणाध्यायः
बृहत्संहिता
38 श्लोक • केवल अनुवाद
सभी मनुष्यों के लिये सभी कालों में यह शात्र उपयोग में आता है; किन्तु राजाओं को विशेष रूप से; इसलिये अब यहाँ शय्यां तथा आसन का लक्षण कहता हूँ।
विजयसार, स्पन्दन, हरिद्रा, देवदारु, तिन्दुकी, शाल, काश्मरी, अञ्जन, पद्मक, शाक, सिं- ये सभी वृक्ष शय्या और आसन के लिये शुभदायी होते हैं।
बिजली, जल, वायु या हाथी द्वारा गिराये हुये, मधुमक्खियों के छत्ते या पक्षियों के घोसलों वाले, चैत्य (प्रधान वृक्ष), श्मशान या मार्ग में स्थित तथा सूखो हुई लताओं से व्याप्त-ये सभी वृक्ष शय्या और आसन के लिये अशुभ होते हैं।
काँटे वाले, महानदी या देवालय में उत्पन्न तथा पश्चिम या दक्षिण दिशा में गिरे हुये सभी वृक्ष शय्या और आसन के लिये अशुभ होते हैं।
अशुभ वृक्ष की लकड़ी से बनी हुयी शव्या और आसन का सेवन करने से कुल का नारा, रोग, भय, धन की हानि, कलह और अनेक प्रकार के अनर्थ होते हैं।
शव्या या आसन के निर्माण से पहले पूर्व में काटे गये वृक्ष के शुभाशुभ फल का परीक्षण कर लेना चाहिये। यदि उस कटे हुये वृक्ष पर अकस्मात् कोई बालक चढ़ जाय तो बह वृक्ष पुत्र और पशु को देने वाला होता है।
शम्या या आसन के निर्माणकाल में सफेद फूल, मतवाला हाथी, दही, अक्षत, जल से भरा हुआ पड़ा, रत्न और अन्य मंगलद्रव्यों का देखना शुभ होता है।
तुषरहित आठ जी को परस्पर पेटा-पेटी करके मिलाने से एक कर्माद्भुत होता है तथा सौ कर्माद्रुततुत्य लम्बी शष्या राजाओं के जय के लिये होती है।
राजपुत्र, मन्त्री, सेनापति और पुरोहित की शय्या क्रम से नब्बे, चौरासी, अठहत्तर और बहत्तर अंगुल लम्बी होनी चाहिये ।
शय्या की लम्बाई के आधे भाग में से उसके (आधे के) अष्टमांश घटा देने पर जो शेष बचे, तत्तुल्य शय्या की चौड़ाई होती है तथा चौड़ाई के तृतीयांशतुल्य कुक्षि और शिर के साथ पाये की ऊँचाई होती है; यह विश्वकर्मा का मत है।
श्रीपर्णी वृक्ष से बनी हुई शय्या धन देने वाली, असन (विजयसार) वृक्ष से बनी हुई शय्या रोग का हरण करने वाली, तिन्दुकसार से बनी हुई शय्या घन देने वाली,
केवल शिंशपा वृक्ष से बनी हुई शय्या बहुत तरह से वृद्धि करने वाली, चन्दन वृक्ष से बनी हुई शय्या शत्रु का नाश, कीर्ति और दीर्घायु करने वाली,
पद्यक वृक्ष से बनी हुई शष्या दीर्घायु, लक्ष्मी, धर्म और धन देने वाली एवं शाल वृक्ष से बनी हुई शय्या कल्याण करने वाली होती है।
केवल चन्दन वृक्ष से बनी हुई, सुवर्ण से मढ़ी हुई और अनेक तरह के रत्नों से व्याप्त शय्या पर शयन करने वाल राजा देवताओं द्वारा भी पूजित होता है।
तिन्दुकी और शिंशपा वृक्ष को लकड़ी में किसी अन्य वृक्ष की लकड़ी मिलाकर तथा श्रीपणों वृक्ष की लकड़ी में देवदारु या असन वृक्ष की लकड़ी मिलाकर बने हुये पलंग या आसन शुभ फल देने वाले नहीं होते हैं।
शाल, शाक-इन दोनों वृक्षों की लकड़ी परस्पर मिली हुई हो या अलग-अलग हो तो भी शुभ फल देने वाली होती है। इसी तर हरिद्रक और कदम्न वृक्ष की लकड़ी परस्पर मिली हुई या अलग-अलग होने पर भी शुभ फल देने वाली होती है।
केबल स्पन्दन वृक्ष की लकड़ी से बने हुये पलंग या आसन शुभ नहीं होते हैं। अम्ब वृक्ष की लकड़ी से बने हुये पलंग या आसन प्राणनाशक होते हैं। अन्य वृक्षों को लकड़ी से युत असन वृक्ष की लकड़ी से बने हुये पलंग या आसन शीघ्र ही बहुत दोष उत्पन्न करने वाले होते हैं।
अम्ब, स्पन्दन और चन्दन वृक्षों से बने हुये पलंगों के पाये स्पन्दन वृक्ष को लकड़ी से बनाने पर शुभ होता है। समस्त फल वाले वृक्षों की लकड़ी से बने हुये पलंग या आसन का उपयोग करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।
पूर्वोक्त समस्त वृक्षों की लकड़ियों के साथ हाथी दाँत को मिलाना शुभ होता है। अत: प्रशस्त लक्षणों से युत हाथीदाँत से पलंग और आसन को भूषित करना चाहिये।
गजदन्त के मूल में जितनी अंगुतात्मक परिधि हो, उसको द्विगुणित करने पर जो प्राप्त हो, ततुल्य मूल से छोड़कर शेष भाग से समस्त कल्पनायें करनी चाहिये। जलाशय देश के हाथियों में उससे कुछ अधिक और पर्वतचारी हाथियों में उससे कुछ कम भाग छोड़कर शेष भाग से समस्त कल्पनायें करनी चाहिये ।
काटने के समय हाथी के दाँत में यदि बिल्ववृक्ष, वर्धमान, छत्र, ध्वज या चामर की तरह चिह्न दिखाई दे तो आरोग्य, धन की वृद्धि और सुख प्राप्त होता है।
इसी प्रकार काटते समय यदि शत्र के समान चिह्न दिखाई दे तो जय, नदी के आवर्त (जलभ्रम) के समान चिह्न दिखाई दे तो नष्ट देश की प्राप्ति, ढेले के समान चिह्न दिखाई दे तो पूर्व में प्राप्त हुये देश की प्राप्ति, खी के समान चिह्न दिखाई दे तो धन का नाश, भृङ्गार के समान चिह्न दिखाई दे तो पुत्र की उत्पत्ति,
घड़े के समान चिह्न दिखाई दे तो निधि की प्राप्ति, दण्ड के समान चिह्न दिखाई दें तो यात्रा में विघ्न; गिरगिट, वानर या सर्प को तरह चिह्न दृष्टिगोचर हो तो दुर्भिक्ष, व्याधि और शत्रु के अधिकार में रहना; गिद्ध, उल्लू, काक या बाज के समान चिह्न दृष्टिगोचर हो तो मरकी,
पाश (फांसी) या कबन्ध ( विना शिर का पुरुष) के समान चिह्न दृष्टिगोचर हो तो राजा को मृत्यु, काटने पर रक्त निकलने लगे तो मनुष्यों के ऊपर विपत्ति तथा वह काला, पीला, रूखा या दुर्गन्धियुक्त हो तो अशुभ करने वाला होता है।
यदि दाँत का छेद सफेद, समान, सुगन्धित या निर्मल हो तो शुभ होता है। ये सभी फल आसन के कहे गये हैं। इसी तरह पूर्वोक्त सभी लक्षण शय्या में भी फल प्रदान करते हैं।
ईषा ( बनाये हुये दक्षिण और वाम तरफ के काष्ठ) के योग प्रदक्षिणक्रम से ( शिर की तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में दक्षिण तरफ के काष्ठ के मूल को, दक्षिण तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में पाँव को तरफ के काष्ठ के मूल को, पाँव की तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में उत्तर तरफ के काष्ठ के मूल को और उत्तर तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में शिर की तरफ के काष्ठ के मूल को) लगाना शुभ होता है-ऐसा आचार्यों का कयन है। अपसव्य (उक्त के विपरीत क्रम से लगाने से भूतों से सम्बन्धित भय होता है।
यदि शय्या या आसन का एक पाया अधोमुख (मूलाग्रविपर्यय = काष्ठ के मूल में पाये का अग्र भाग या काष्ठ के अग्र भाग में पाये का मूल) हो तो उस पर सोने वाले को पाँव में पीड़ा, दो पाये अधोमुख हों तो भुक्त अन्न अजोर्ण और तीन या चार पाये अधोमुख हों तो क्लेश, वध और बन्धन होता है।
यदि पाये का शिर छिद्रयुत, विवर्ण या ग्रन्थियुत हो तो उस पर सोने वाले को व्याधि होती है। इसी प्रकार यदि पैर के
कुम्भ में गाँठ हो तो उदररोग, जंघा (कुम्भ के नीचे भाग) में गाँठ हो तो जंघाओं में भय, आधार (जंघा के नीचे का भाग) में गाँठ -हो तो धन का नाश,
खुरप्रदेश में गाँठ हो तो खुर वाले जानवरों को पीड़ा तथा ईषा (पार्श्व काष्ठ) और शोर्षणी (शिर की तरफ का काष्ठ) के तिहाई पर गाँठ हो तो कल्याणकारी नहीं होता है।
निष्कुट, कोलाक्ष, सूकरनयन, वत्सनाभ, कालक, धुन्धुक-ये संक्षेप से छिद्रों की संज्ञायें कही गई हैं।
यदि छिद्र के मध्य में पड़े के समान चौड़ा और ऊपर तंग मुख की आकृति दिखाई दे तो निष्कुट, शालि धान्य या उडद के बराबर नील
उडद के बराबर नील वर्ण का छिद्र हो तो कोलाक्ष, विषम, विवर्ण और डेड़ पर्व लम्बा छिद्र हो तो सूकरनयन, एक पर्व लम्बा वामावर्त छिद्र हो तो वत्सनाभ, काला छिद्र हो
कालक और दूसरी तरफ से भी दिखाई देने वाला काला छिद्र हो तो वह छिद्र धुन्धुक संज्ञक होता है। काष्ठ के समान वर्ण वाले अशुभ छिद्र भी विशेष अशुभ फल नहीं देते हैं।
यदि निष्कुट नामक छिद्र हो तो धन का नाश, कोलाक्ष नामक छिद्र हो तो कुल का क्षय, सूकरनयन नामक छिद्र हो तो शत्रभय और वत्सनाभ नामक छिद्र हो तो रोग का भय होता है।
यदि कालक और पुन्युकसंज्ञक छिद्र कीटों से व्याप्त (पुनखौक) हो तो शुभ नहीं होता है तथा बहुत गाँठों से युक्त सभी प्रकार की लकड़ियाँ सभी जगहों पर शुभ देने वाली नहीं होती हैं अर्थात् बहुत गाँठ वाली कोई भी लकड़ी कहीं पर भी शुभद नहीं होती है।
एक वृक्ष के काठ से बनी हुई शय्या धन्य, दो वृक्षों के काठ से बनी हुई धन्यतर, तीन वृक्षों के काठ से बनी हुई शय्या पुत्रों को बढ़ाने वाली और चार वृक्षों के काठ से बनी हुई शव्या उत्तम धन और यश प्रदान करने वाली होती है।
पाँच वृक्षों के काठ से बनी हुई शय्या पर जो व्यक्ति शयन करता है, उसकी मृत्यु होती है तथा छः, सात या आठ वृक्षों के काठ से बनी हुई शय्या कुल का नाश करती है।
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