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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 16
*शुभदौ तु शालशाकी परस्परं संयुतौ पृथक् चैव । तद्वत् पृथक् प्रशस्तौ सहितौ च हरिद्रककदम्बी ॥
शाल, शाक-इन दोनों वृक्षों की लकड़ी परस्पर मिली हुई हो या अलग-अलग हो तो भी शुभ फल देने वाली होती है। इसी तर हरिद्रक और कदम्न वृक्ष की लकड़ी परस्पर मिली हुई या अलग-अलग होने पर भी शुभ फल देने वाली होती है।
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