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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 15
अन्येन समायुक्ता न तिन्दुकी शिंशपा च शुभफलदा । न श्रीपर्णेन च देवदारुवृक्षो न चाप्यसनः ॥
तिन्दुकी और शिंशपा वृक्ष को लकड़ी में किसी अन्य वृक्ष की लकड़ी मिलाकर तथा श्रीपणों वृक्ष की लकड़ी में देवदारु या असन वृक्ष की लकड़ी मिलाकर बने हुये पलंग या आसन शुभ फल देने वाले नहीं होते हैं।
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