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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 36
कालकधुन्धुकसंज्ञं कीटैर्विद्धं च न शुभदं छिद्रम् । सर्व ग्रन्थिप्रचुरं सर्वत्र न शोभनं दारु ॥
यदि कालक और पुन्युकसंज्ञक छिद्र कीटों से व्याप्त (पुनखौक) हो तो शुभ नहीं होता है तथा बहुत गाँठों से युक्त सभी प्रकार की लकड़ियाँ सभी जगहों पर शुभ देने वाली नहीं होती हैं अर्थात् बहुत गाँठ वाली कोई भी लकड़ी कहीं पर भी शुभद नहीं होती है।
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