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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 37
एकद्रुमेण धन्यं वृक्षद्वयनिर्मितं च धन्यतरम् । त्रिभिरात्मजवृद्धिकरं चतुर्भिरर्थ यशश्चाय्यम् ॥
एक वृक्ष के काठ से बनी हुई शय्या धन्य, दो वृक्षों के काठ से बनी हुई धन्यतर, तीन वृक्षों के काठ से बनी हुई शय्या पुत्रों को बढ़ाने वाली और चार वृक्षों के काठ से बनी हुई शव्या उत्तम धन और यश प्रदान करने वाली होती है।
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