एकेनावाक्शिरसा भवति हि पादेन पादवैकल्यम्। द्वाभ्यां न जीर्यतेऽन्नं त्रिचतुर्भिः क्लेशवघवन्याः ॥
यदि शय्या या आसन का एक पाया अधोमुख (मूलाग्रविपर्यय = काष्ठ के मूल में पाये का अग्र भाग या काष्ठ के अग्र भाग में पाये का मूल) हो तो उस पर सोने वाले को पाँव में पीड़ा, दो पाये अधोमुख हों तो भुक्त अन्न अजोर्ण और तीन या चार पाये अधोमुख हों तो क्लेश, वध और बन्धन होता है।
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