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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 34
कालकसंज्ञं कृष्णं धुन्धुकमिति यद्भवेद्विनिर्भिन्नम् । दारुसवर्ण छिद्रं न तथा पापं समुद्दिष्टम् ॥
कालक और दूसरी तरफ से भी दिखाई देने वाला काला छिद्र हो तो वह छिद्र धुन्धुक संज्ञक होता है। काष्ठ के समान वर्ण वाले अशुभ छिद्र भी विशेष अशुभ फल नहीं देते हैं।
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