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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 20
दन्तस्य मूलपरिधिं द्विरायतं प्रोह्य कल्पयेच्छेषम्। अधिकमनृपचराणां यूनं गिरिचारिणां किञ्चित् ॥
गजदन्त के मूल में जितनी अंगुतात्मक परिधि हो, उसको द्विगुणित करने पर जो प्राप्त हो, ततुल्य मूल से छोड़कर शेष भाग से समस्त कल्पनायें करनी चाहिये। जलाशय देश के हाथियों में उससे कुछ अधिक और पर्वतचारी हाथियों में उससे कुछ कम भाग छोड़‌कर शेष भाग से समस्त कल्पनायें करनी चाहिये ।
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