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बृहत्संहिता • अध्याय 79 • श्लोक 26
ईषायोगे दारु प्रदक्षिणायं प्रशस्तमाचार्यैः । अपसव्यैकदिगये भवति भयं भूतसञ्जनितम् ॥
ईषा ( बनाये हुये दक्षिण और वाम तरफ के काष्ठ) के योग प्रदक्षिणक्रम से ( शिर की तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में दक्षिण तरफ के काष्ठ के मूल को, दक्षिण तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में पाँव को तरफ के काष्ठ के मूल को, पाँव की तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में उत्तर तरफ के काष्ठ के मूल को और उत्तर तरफ के काष्ठ के अग्र भाग में शिर की तरफ के काष्ठ के मूल को) लगाना शुभ होता है-ऐसा आचार्यों का कयन है। अपसव्य (उक्त के विपरीत क्रम से लगाने से भूतों से सम्बन्धित भय होता है।
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