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अध्याय 30 — अथ सन्ध्यालक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
33 श्लोक • केवल अनुवाद
अर्जास्त सूर्यविम्ब के बाद आकाश में नक्षत्रगण अच्छी तरह नहीं दिखाई देने तक एक सन्ध्या (सायं सन्ध्या) और नक्षत्रों के स्वल्प कान्ति होने के बाद अद्धोंदित सूर्य विम्ब होने तक दूसरी (सायं सन्ध्या) होती है। लक्षणों के द्वारा इसका फल आगे कहते हैं।
अरण्यवासी पशु, पक्षी, वायु, रवि-चन्द्र के परिवेष, प्रतिसूर्य, परिप, मेपरेखा, वृक्षाकार मेघ, इन्द्रधनु, गन्धर्भनगर, सूर्य की रश्मि, दण्ड (रविकिरण, जल और बायु का संपात), पूली-इन सथों के सन्ध्याकालिक स्नेह और वर्षों से फल कहना चाहिये।
बार-बार ऊँचा भयंकर शब्द करने बाला मूग ग्रामों के नाश का सूचक है तथा सेना के दक्षिण भाग में स्थित सूर्याभिमुख होकर भयंकर शब्द करे तो सेनाओं को नष्ट करता
यदि सन्याकाल में सेनाओं के वाम भाग में सूर्याभिमुख होकर मृगसमूह या बाबु हो तो संग्राम, दधिष में मूयाभिमुख नहीं होकर स्थित हो तो सेनाओं का समागम और दोनों तरफ स्थित हो तो दृष्टि होती है।
सूयाभिमुख हुये मृग और पक्षियों के शब्दयुत प्रातः सन्ध्या देश का नाश करती है तथा सूर्याभिमुख होकर दक्षिण दिशा में स्थित मृग और पक्षियों के शब्दयुत सन्ध्या शत्रुओं द्वारा नगर को हस्तगत कराती है।
गृह, बुथ और तोरण (पुरद्वार) को कम्मित करती हुई, धूली और मूलखण्डों से युद, प्रबल, भयंकर, रुख तथा आकाश से पक्षियों को गिराती हुई सन्ध्या समय की हया शुभ फल देने वाली होती है।
मन्द-मन्द चलती हुई हवा से कम्पित पत्रों से युक्त वृक्ष, वायु से रहित या मधुर शब्द करने वाले, शान्त पक्षी और मृगों से युक्त सन्ध्या शुभ होती है।
दण्ड, विद्युत्, मछली को आकृति याला मेघ, प्रतिसूर्य, परिघ, इन्द्रधनु, ऐरावत (४७ अध्याय २०याँ श्लोक), सूर्यकिरण- ये सब यदि सन्ध्याकाल में निर्मल हों तो सृष्टि करने वाले होते हैं।
सन्ध्याकाल में खण्ड, विषम, वर्णरहित, विकृत, कुटिल, अप्रदक्षिणक्रम से परिवेष्टित, सूक्ष्म, छोटा, शक्तिरहित तथा मलिन सूर्य का किरण हो तो मनुष्यों में परस्पर विरोध और वृष्टि को करता है।
पदि अन्धकाररहित आकाश में तेजपुत, भिर्मल, स्पष्ट, दीपं और दक्षिणावर्त रूप से परिवेटित सूर्य का किरण हो तो संसार का कल्याण करने बाला होता है।
सम्पूर्ण आकाश को व्याप्त करने वाले, निर्मल, अखण्डित और स्पष्ट सूर्य के किरण अमोघ संज्ञक (शुभ फल देने वाले) होते हैं।
कल्माष (पोला, बेत और काला वर्ष मिश्रित), बोदे पोले, विचित्र, मझीठ (मजीठ) की तरह हरे, काला-चेत दोनों मिले हुये और सम्पूर्ण आकारामण्डल को व्याप्त करके स्थित सूर्य के किरण दिखाई दें तो उसके सात दिन बाद से वृष्टि और बोड़ा भय करते हैं।
सूर्यकिरण यदि ताम्रवर्ण की हो तो सेनापति की मृत्यु, पीले और लालरंग के सदृश हो तो सेनापति को कष्ट, हरे रंग के समान हो तो पशु तथा धान्य का नाश, धूमवर्ण को हो तो गायों का नाश
मजीठ वर्ण की हो तो शत्र तथा अग्नि से भय, पीले हों तो वायु के झकोरों से युक्त वर्षा, भस्मसमान हो तो अनावृष्टि, सफेद, काले, नीले, पोले इन सब मिले हुये वर्षों की तरह हो तो बहुत ही कम वर्षा होती है।
यदि बन्यूक-पुष्प या अशन की तरह होकर धूली सूर्य की तरफ जाय तो लोग सैकड़ों रोगों से पीड़ित होते हैं तथा बेत चर्च की होकर पूली सूर्य की तरफ जाय तो लोगों की वृद्धि और शान्ति के लिये होती है।
सूर्यकिरण, मेघ, वायु-ये तीनों मिलकर दण्ड की तरह स्थित हों तो उसको दण्ड कहते हैं। यह दण्ड कोणों में स्थित हो तो राजाओं का और दिशाओं में स्थित हो तो चारो वर्णों का अशुभ करता है।
यदि यह दण्ड सूर्योदय, मध्याह या सूर्यास्त काल में दिखाई दे तो शस्रभय और उपद्रव करता है तथा बेत वर्ण का हो तो ब्राह्मणों का, रक्तवर्ण का हो तो क्षत्रियों का, पीत वर्ण का हो तो वैश्यों का और कृष्ण वर्ण का हो तो शूद्रों का नाश करता है। साथ ही यह जिस दिशा के सम्मुख स्थित हो, उस दिशा का नाश करता है। सूर्य के समीप का इसका भाग मूल और दूसरी तरफ मुख होता है।
दही के समान अग्र भाग वाले, नोल वर्ण के भाग से सूर्य को आच्छादित करने बाले, आकाश के मध्य में स्थित, पीले रङ्ग से रंगे और मूल की तरफ सघन मेघवृक्ष हों तो अधिक वृष्टि करते हैं।
शत्रु के ऊपर चढ़ाई करने वाले विजयेच्छु राजा के पीछे-पीछे कुछ दूर जाकर यदि मेषवृक्ष नष्ट हो जाय तो उस राजा का मरण होता है। यदि बही मेघवृक्ष बाल (छोटे) वृक्ष की तरह हो तो युवराज और मन्त्री का मरण होता है।
नील कमल, वैदूर्य मणि या कमल के केशर की तरह कान्ति वाली, यायु से रहित और सूर्य के किरणों से प्रकाशित सन्ध्या हो तो उसी दिन वृष्टि करती है।
गन्धर्वनगर, हिम, धूम और धूली से युक्त सन्ध्या वर्षाकाल में अवृष्टि तथा अन्य ऋतु में शख-कोप करती है।
शिशिर ऋतु में लाल, बसन्त ऋतु में पीला, ग्रीष्म ऋतु में श्वेत, वर्षा ऋतु में चित्र, शरद् ऋतु में कमल की तरह और यदि हेमन्त ऋतु में रुधिर की तरह सन्ध्या का वर्ण हो तो शुभ; अन्यथा अंशुभ फल होता है।
यदि सन्ध्याकाल में शल लिये हुए पुरुष को तरह मेघखण्ड दिखाई दे तो शत्रु का भय, सूर्य से आच्छादित और श्रेत वर्ण का गन्धर्व-नगर दिखाई दे तो पुर का लाभ और सूर्य से भेदित गन्धर्व-नगर हो हो पुर का नाश होता है।
शुक्त और शुभ (स्वच्छ) किरण वाले या बोरण (गांदर) के समान कान्ति बाले शान्त दिशा में उत्पत्र मेथ सूर्य के दक्षिण भाग को आभ्यादित करे तो वृद्धि करता है।
सूर्योदयकाल में उत्पत्र मेघरेखा यदि शुक्त वर्ष की हो तो राजा का नाश, रक्तवर्ण की हो तो सेना का नाश और सुवर्ण की तरह कान्ति याली हो तो सेनाओं को वृद्धि करती है।
यदि सूर्य के दोनों तरफ परिधि (प्रतिसूर्य) दिखाई दे तो अधिक वृष्टि होती है तथा यदि परिधि सभी दिशाओं को व्याप्त करके स्थित हो तो जल का एक कण भी नहीं गिरता है अर्थात् अवृष्टि होती है।
यदि सन्ध्याकाल में ध्वन, छत्र, पर्वत, हाथी या घोड़े की तरह रक्त वर्ण का मेप दिखाई दे तो युद्ध के लिये होता है।
यदि पलाल (पुअरा पुआल पूस भूसा), धुर्वे की तरह निर्मल शरीर वाला मेम हो तो राजाओं के सेनाओं की वृद्धि दोनों सन्ध्याओं में लटके हुये,
वृक्ष की तरह, अतिलोहित वर्षों से प्रकाशित और पुर की करता है। यदि तरह मेघ दिखाई दे तो शुभ करता है।
यदि सन्ध्याकाल में सूर्य के सम्मुख स्थित हुये पथी, मृगाल और मृगों के शब्दों से एक, पूति, परिष आदि (इन्द्रधनु, गन्धर्षनगर या हिम) से अथवा प्रतिदिन विकारयुक मूर्व से युक्त सन्ख्या हो तो देश, राजा और सुभिक्ष का नाश करती है।
पूर्व सन्ध्या अपने फल को उसी समय में देती है। सायं सन्ध्या रात्रि या तीन दिन में, परिवेष, धूलि, परिष, अमोष, सूर्य के किरण, इन्द्रधनु, प्रतिसूर्य, मेघ और वायु उसी समय या सात दिन में, पक्षी उसी समय या आठ दिन में और मृग सात दिन में शुभाशुभ फल करते हैं।
सन्ध्या अपनी कान्ति से प्रकाश करती है और उतनी ही दूर तक फल देती है तथा विद्युत् छः योजन तक और मेयों का गर्जन पाँच योजन तक प्रकाश करता है और उतनी हो दूर तक फल देता है। किसी-किसी (देवल आदि) आचार्य का मत है कि उल्कापात होने में फल में प्रदेश की इयत्ता नहीं है; अपितु सर्वत्र फल देने वाला होता है।
प्रतिसूर्य नामक परिधि का सीन योजन तक, परिप का पाँच योजन तक, परिवेषचक्र का पाँच या छः योजन तक और इन्द्रधनुष का दश योजन तक प्रकाश जाता है और उतनी हो दूर तक ये सब फल भी देते हैं।
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