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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 32
एक दीप्त्या योजनं भाति सन्ध्या विद्युद्धासा षट् प्रकाशीकरोति । पञ्चाब्दानां गर्जितं याति शब्दो नास्तीयत्ता केचिदुल्कानिपाते ॥
सन्ध्या अपनी कान्ति से प्रकाश करती है और उतनी ही दूर तक फल देती है तथा विद्युत् छः योजन तक और मेयों का गर्जन पाँच योजन तक प्रकाश करता है और उतनी हो दूर तक फल देता है। किसी-किसी (देवल आदि) आचार्य का मत है कि उल्कापात होने में फल में प्रदेश की इयत्ता नहीं है; अपितु सर्वत्र फल देने वाला होता है।
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