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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 26
उभयपार्थगती परिधी रवेः प्रचुरतोयकरौ वपुषान्वितौ । अब स मस्तककुप्यरिचारिणः परिधयोऽस्ति कणोऽपि न वारिणः ॥
यदि सूर्य के दोनों तरफ परिधि (प्रतिसूर्य) दिखाई दे तो अधिक वृष्टि होती है तथा यदि परिधि सभी दिशाओं को व्याप्त करके स्थित हो तो जल का एक कण भी नहीं गिरता है अर्थात् अवृष्टि होती है।
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