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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 5
दीप्तमृगाण्डजविरुता प्राक् सन्थ्या देशनाशमाख्याति । दक्षिणदिक्स्थैर्विरुता ग्रहणाय पुरस्य दीप्तास्यैः ॥
सूयाभिमुख हुये मृग और पक्षियों के शब्दयुत प्रातः सन्ध्या देश का नाश करती है तथा सूर्याभिमुख होकर दक्षिण दिशा में स्थित मृग और पक्षियों के शब्दयुत सन्ध्या शत्रुओं द्वारा नगर को हस्तगत कराती है।
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