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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 15
बन्यूकपुष्पाञ्जनचूर्णसन्निभं सान्ध्यं रजोऽभ्येति यदा दिवाकरम् । लोकस्तदा रोगशनैर्निपीड्यत शुक्लं रजो लोकविवृद्धिशान्तये ॥
यदि बन्यूक-पुष्प या अशन की तरह होकर धूली सूर्य की तरफ जाय तो लोग सैकड़ों रोगों से पीड़ित होते हैं तथा बेत चर्च की होकर पूली सूर्य की तरफ जाय तो लोगों की वृद्धि और शान्ति के लिये होती है।
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