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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 33
प्रत्यर्कसंज्ञः परिधिस्तु तस्य त्रियोजनाभः परिधस्य पञ्च। षट्पञ्चदृश्यं परिवेषचक्रं दशामरेशस्य धनुर्विभाति ॥
प्रतिसूर्य नामक परिधि का सीन योजन तक, परिप का पाँच योजन तक, परिवेषचक्र का पाँच या छः योजन तक और इन्द्रधनुष का दश योजन तक प्रकाश जाता है और उतनी हो दूर तक ये सब फल भी देते हैं।
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