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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 31
प्राची तत्क्षणमेव नक्तमपरा सन्ध्या त्र्यहाद्वा फलं सप्ताहात् परिवेषरेणुपरिधाः कुर्वन्ति सद्यो न चेत्। तद्वत् सूर्यकरेन्द्रकार्मुकतडित्प्रत्यर्कमेघानिला- स्तस्मिन्नेव दिनेऽष्टमेऽथ विहगाः सप्ताहपाका मृगाः ॥
पूर्व सन्ध्या अपने फल को उसी समय में देती है। सायं सन्ध्या रात्रि या तीन दिन में, परिवेष, धूलि, परिष, अमोष, सूर्य के किरण, इन्द्रधनु, प्रतिसूर्य, मेघ और वायु उसी समय या सात दिन में, पक्षी उसी समय या आठ दिन में और मृग सात दिन में शुभाशुभ फल करते हैं।
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