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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 4
अपसव्ये संग्रामः सव्ये सेनासमागमः शान्ते। मृगचक्के पवने वा सख्यायां मिश्रगे वृष्टिः ॥
यदि सन्याकाल में सेनाओं के वाम भाग में सूर्याभिमुख होकर मृगसमूह या बाबु हो तो संग्राम, दधिष में मूयाभिमुख नहीं होकर स्थित हो तो सेनाओं का समागम और दोनों तरफ स्थित हो तो दृष्टि होती है।
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