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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 2
मृगशकुनिपवनपरिवेषपरिधिपरिघाभ्रवृक्षसुरचापैः । गन्धर्वनगररविकरदण्डरजः स्नेहवर्णेच ॥
अरण्यवासी पशु, पक्षी, वायु, रवि-चन्द्र के परिवेष, प्रतिसूर्य, परिप, मेपरेखा, वृक्षाकार मेघ, इन्द्रधनु, गन्धर्भनगर, सूर्य की रश्मि, दण्ड (रविकिरण, जल और बायु का संपात), पूली-इन सथों के सन्ध्याकालिक स्नेह और वर्षों से फल कहना चाहिये।
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