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बृहत्संहिता • अध्याय 30 • श्लोक 10
उद्‌द्योतिनः प्रसन्ना ऋजयो दीर्घाः प्रदक्षिणावर्ताः । किरणाः शिवाय जगतो वितमस्के नभसि भानुमतः ॥
पदि अन्धकाररहित आकाश में तेजपुत, भिर्मल, स्पष्ट, दीपं और दक्षिणावर्त रूप से परिवेटित सूर्य का किरण हो तो संसार का कल्याण करने बाला होता है।
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