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अध्याय 19 — आनुग्रहिक

प्रबोधसुधाकर
31 श्लोक • केवल अनुवाद
देखो, पूतना स्तनों में विषम विष लगाकर उन्हें पिलाने के लिये घर में आयी थी, किन्तु उस बड़भागिनी का शरीर श्रीकृष्ण के अर्पण हो गया!
शकटासुर बड़ा अपराधी था तथापि भगवान् कृष्ण ने उसे अपने निकट बुला लिया (अर्थात् उसे मारकर अपना धाम दिया), और बाल्यावस्था में ही उन्होंने (तृणावर्त) असुर को गला घोंटकर मार डाला।
चिरकाल से दुःखी यमलार्जुन-वृक्षों को ऊखल में बँधे-बँधे ही अपने घर के आँगन में रेंगते हुए श्रीकृष्ण ने उखाड़कर अपने लोक को भेज दिया।
उन श्रीकृष्णचन्द्र ने ही देवताओं से नित्य द्वेष करने वाले केशी का वध किया और (उन्हीं की कृपा से) बेचारे तुच्छ काकासुर और बकासुर भी शोकरहित लोकों को गये।
बड़े भारी अजगर रूप अघासुर को, जो गौवों, गोपों और गोपियों को अपने पेट में डालकर अति पीड़ा पहुँचा रहा था, मारकर भगवान्ने अनघ (निष्पाप) कर दिया।
जो अपने तेज के कारण अति असह्य था, बन में लगे हुए उस दावानल को पीकर उसके कारण दग्ध और मुग्ध हुए समस्त गोपों की कृपासागर भगवान्ने रक्षा की।
वज्र, बिजली और वर्षा से व्याकुल गोकुल की रक्षा करने के लिये कृष्णचन्द्र ने बिना किसी की सहायता के ही एक हाथ पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया।
वस्त्रों के लोभ से भागते हुए धोबी को पत्थरों से मारकर भगवान्ने उसके अपराध को भूलकर उसे बैकुण्ठ-वास दिया।
तीन ओर से टेढ़े शरीर वालीं और अति लंबे-लंबे होठों वालीं कुब्जा को जिसके शरीर और वाणी प्रेमवश कम्पायमान हो रहे थे, केवल माला और चन्दन से ही सन्तुष्ट होकर, सुन्दरी सुमुखी बना दिया।
बड़ा ऊँचा और मदोन्मत्त कुवलयापीड हाथी भगत्रान् हरि के चरण की ठोकर से मारा जाकर इस प्रकार गिरा जैसे दीपक के सामने पतङ्ग गिरता है।
युद्ध के मिप से ही रङ्ग भूमि में श्रीरमानाथ का अङ्ग सङ्ग पाकर मुष्टिक और चाणूर नाम के पहलवान तुरन्त मोक्षपद को प्राप्त हो गये।
अपने देहकृत अपराधों से ही बैकुण्ठ-प्राप्ति की उत्कण्ठा बाले कंस को यदुकुलभूषण कृष्णचन्द्र ने नष्ट कर दिया।
हरि के दर्शन का सुयोग मिल जाने से अति महान् युद्ध-तीर्थ में दूब जाने वाले उस चेदिराज शिशुपाल को भगवान्‌ ने तुरन्त सायुज्य मुक्ति दे दी।
मत्स्यादि अवतारों में भगवान्ने जिन-जिन अनेकों देव-द्रोहियों को मारा उन सभी को अपना ही रूप दे दिया, मोक्ष की तो बात ही क्या है?
यदुनन्दन ने जिन-जिनका वध किया उनको तो फिर पुनर्जन्म की प्राप्ति हुई नहीं; अतः समस्त अवतारों के प्रवर्तक अन्तर्यामी श्रीकृष्णचन्द्र ही हैं।
जिन्होंने ब्रह्माजी को अनेक ब्रह्माण्ड, प्रत्येक ब्रह्माण्ड में जुदे-जुदे अति अद्भुत ब्रह्मा, वत्सों के सहित समस्त गोपों तथा (भिन्न- भिन्न ब्रह्माण्डों के) समस्त विष्णु दिखाये; और जिनके चरणोदक को श्रीशङ्कर अपने शिर पर धारण करते हैं वे श्रीकृष्ण त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) से भिन्न कोई अविकारिणी सच्चिदानन्दमयी नीलिमा हैं।
त्रिपुरारि शिव और कमलासन ब्रह्मा जिनकी कृपा के पात्र है, परमपावन श्रीगंगाजी जिनके चरण-नख का घोवन हैं तथा त्रिलोकी का राज्य जिनका दान है वे सर्वव्यापक और हम सबके आदि-कारण तथा कुलदेव श्रीयदुनाथ सदा विजयी हो रहे हैं।
हे कृष्णनाम्नी मानेश्वरि! मोहरूपी मृलनक्षत्र में उत्पन्न हुए मुझ पुत्र को भरण-पोषण के लिये माया के हाथों में सौंपकर तू बहुत दिनों से मेरी ओर से उदासीन हो गयी है। अरी एकमात्र करुणामयी माँ! तू एक बार भी मेरा मुख नहीं देखती हे सर्वज्ञे! क्या तू उस मोहरूपी मूल की शान्ति करने में समर्थ नहीं है?
आप हमारे पिता तो उदासीन, निष्क्रिय, सदा निर्गुण और असंग ठहरे; अतः अब हमारे जीवन की और क्या गति होगी। अच्छा यदि आप हमसे अकारण ही स्नेह नहीं कर सकते तो अपने निर्मल निवास-स्थानरूप इस अन्तःकरण में तो बसो।
आप लोकाधीश स्वामी के रहते हुए आपके आश्रितों को संसारजन्य क्लेश क्यों उठाना पड़ता है? क्या सूर्यमण्डल के उदय होने पर भी कमल कभी मुरझाते हैं? यदि कहो कि संसार में मनुष्यों को अपने पूर्वकृत कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है, तो मनुष्यों के मांस से पुष्ट हुए उन मेरे जाने हुए दैत्यराजों ने अवश्य आपके बल को जीत लिया था।
नित्यानन्दरूपी अमृत के समुद्र से निकला हुआ और सज्जनों की उत्कण्ठारूप प्रबल वायु से उड़ाकर लाया हुआ सत्वरूप नीलमेघ तेरे पास ही अद्भुत विज्ञानामृत की अपने वचनरूपी धाराओं में वर्षा कर रहा है। अरे चित्तरूपी पपीहे! यदि तुझे उसे पीने की इच्छा नहीं होती तो तुझे व्यर्थ ही किसी ने पकड़ रक्खा है, या तू सो गया है?
अरे चित्त! चञ्चलता को छोड़कर अपने सामने तराजू के दोनों पलड़ो को रख; उनमें से एक में समस्त विषयों को और दूसरे में भगवान् श्रीपति को रख। उन दोनों में से किसमें अधिक शान्ति और हित है इसका विचार कर, और युक्ति तथा अनुभव से जिसमें परमानन्द की प्रतीति हो उसी का सेवन कर।
पुत्र, पौत्र, स्त्रियाँ, अन्य युवतियाँ, विभव तथा अन्य प्रकार के धन और भोज्य आदि पदार्थों में तारतम्य होने से इनमें कमी उत्कण्ठा की शान्ति नहीं होती; किन्तु अनन्त और अति गम्भीर आनन्दामृतसिन्धु श्रीयदुनायक के चित्त में उदय होकर खच्छन्द विहार करने पर ऐसा नहीं होता, क्योंकि उस समय चित्त खच्छन्द एवं निर्भय हो जाता है।
कोई लोग तो सकाम उपासना के द्वारा नित्यप्रति अपने किसी अभीष्ट फल की प्रार्थना किया करते हैं, और कोई योग तथा यज्ञादि अन्य साधनों से स्वर्ग और अपवर्ग की याचना करते हैं। किन्तु श्रीयदुनाथ के चरण कमलों के ध्यान में ही सावधान रहने के इच्छुक इम लोगों को लोक से, दम से, राजा से, स्वर्ग से और अपवर्ग से क्या काम है?
भगवान् श्रीर्पात अपने आश्रितमात्र पुरुष को अपनी ओर इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे सामने आये हुए जड लोहे को चुम्बक खींच लेता है।
भगवान् कृपा करते समय यह नहीं देखते कि जाति, रूप, सम्पत्ति और अवस्था के विचार से अमुक पुरुष तो उत्तम है और अमुक अधम।
यह अन्तर्यामी परमात्मारूप महामेघ पुरुष के आन्तरिक भाव का ही भोक्ता है। वर्षा के समय मेघ यह कब विचारता है कि 'यह तो खदिर (खैर) है और यह चम्पा है'।
यद्यपि भगवान् सर्वत्र समान हैं तथापि वे नृहरि (मनुष्यरूप हरि) भी हैं; तथा ये भक्तजन उनकी दयामयी दृष्टि से नित्य परमानन्द में मग्न रहते हैं।
जिनका कोई अन्य आश्रय नहीं है ऐसे कछुई के बच्चे जिस प्रकार दूध आदि आहार के बिना ही केवल माता की स्नेह-दृष्टि से ही पलते हैं, उसी प्रकार अनन्य भक्त भी भगवान्‌ की दया-दृष्टि के सहारे ही जीवन-निर्वाह करते हैं।
यद्यपि आकाश शून्यरूप है तथापि चातक और चकोर नामक पक्षियों की दृढ़ भावना से मेघ और चन्द्रमा के रूप में वह उनकी आशाओं को पूर्ण कर देता है।
इसी प्रकार वाणी और मन के अगोचर होकर भी श्रीहरि अपने शरणागत पुरुषों की कामनाओं को अकारण ही कृपापूर्वक सत्यानन्दरूपी प्रचुर अमृत से पूर्ण कर देते हैं।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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