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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 23
पुत्रान्पौत्रमथस्त्रियोऽन्ययुवतीर्वित्तन्यथोऽन्यद्धनं भोज्यादिष्वपि तारतम्यवशतो नालं समुत्कण्ठया । नैतादृग्यदुनायके समुदिते चेतस्यनन्ते विभौ सान्द्रानन्दसुधार्णवे विहरति स्वैरं यतो निर्भयम् ॥
पुत्र, पौत्र, स्त्रियाँ, अन्य युवतियाँ, विभव तथा अन्य प्रकार के धन और भोज्य आदि पदार्थों में तारतम्य होने से इनमें कमी उत्कण्ठा की शान्ति नहीं होती; किन्तु अनन्त और अति गम्भीर आनन्दामृतसिन्धु श्रीयदुनायक के चित्त में उदय होकर खच्छन्द विहार करने पर ऐसा नहीं होता, क्योंकि उस समय चित्त खच्छन्द एवं निर्भय हो जाता है।
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