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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 3
यमलार्जुनौ तरू उन्मूल्योलूखलगतश्चिरं खिन्नौ । रिङ्गन्नङ्गणभूमौ स्वमालयं प्रापयन्नृहरिः ॥
चिरकाल से दुःखी यमलार्जुन-वृक्षों को ऊखल में बँधे-बँधे ही अपने घर के आँगन में रेंगते हुए श्रीकृष्ण ने उखाड़कर अपने लोक को भेज दिया।
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