इसी प्रकार वाणी और मन के अगोचर होकर भी श्रीहरि अपने शरणागत पुरुषों की कामनाओं को अकारण ही कृपापूर्वक सत्यानन्दरूपी प्रचुर अमृत से पूर्ण कर देते हैं।
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