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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 31
तद्वद्रजतां पुंसां दृग्वाङ्मनसामगोचरोऽपि हरिः । कृपया फलत्यकस्मात्सत्यानन्दामृतेन विपुलेन ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रबोधसुधाकरः समाप्तः ॥
इसी प्रकार वाणी और मन के अगोचर होकर भी श्रीहरि अपने शरणागत पुरुषों की कामनाओं को अकारण ही कृपापूर्वक सत्यानन्दरूपी प्रचुर अमृत से पूर्ण कर देते हैं।
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