यह अन्तर्यामी परमात्मारूप महामेघ पुरुष के आन्तरिक भाव का ही भोक्ता है। वर्षा के समय मेघ यह कब विचारता है कि 'यह तो खदिर (खैर) है और यह चम्पा है'।
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