अरे चित्त! चञ्चलता को छोड़कर अपने सामने तराजू के दोनों पलड़ो को रख; उनमें से एक में समस्त विषयों को और दूसरे में भगवान् श्रीपति को रख। उन दोनों में से किसमें अधिक शान्ति और हित है इसका विचार कर, और युक्ति तथा अनुभव से जिसमें परमानन्द की प्रतीति हो उसी का सेवन कर।
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