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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 22
चेतश्चञ्चलतां विहाय पुरतः संधाय कोटिद्वयं तत्रैकत्र निधेहि सर्वविषयानन्यत्र च श्रीपतिम् । विश्रान्तिर्हितमप्यहो क्व नु त्वयोर्मध्ये तदालोच्यतां युक्त्या वानुभवेन यत्र परमानन्दश्च तत्सेव्यताम् ॥
अरे चित्त! चञ्चलता को छोड़कर अपने सामने तराजू के दोनों पलड़ो को रख; उनमें से एक में समस्त विषयों को और दूसरे में भगवान् श्रीपति को रख। उन दोनों में से किसमें अधिक शान्ति और हित है इसका विचार कर, और युक्ति तथा अनुभव से जिसमें परमानन्द की प्रतीति हो उसी का सेवन कर।
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