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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 18
मायाहस्तेऽर्पयित्वा भरणकृतिकृते मोहमूलोद्भवं मां मातः कृष्णाभिधाने चिरसमयमुदासीनभावं गतासि । कारुण्यैकाधिवासे सकृदपि वदनं नेक्षसे त्वं मदीयं तत्सर्वज्ञे न कर्तुं प्रभवसि भवती किं नु मूलस्य शान्तिम् ॥
हे कृष्णनाम्नी मानेश्वरि! मोहरूपी मृलनक्षत्र में उत्पन्न हुए मुझ पुत्र को भरण-पोषण के लिये माया के हाथों में सौंपकर तू बहुत दिनों से मेरी ओर से उदासीन हो गयी है। अरी एकमात्र करुणामयी माँ! तू एक बार भी मेरा मुख नहीं देखती हे सर्वज्ञे! क्या तू उस मोहरूपी मूल की शान्ति करने में समर्थ नहीं है?
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