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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 21
नित्यानन्दसुधानिधेरधिगतः सन्नीलमेघः सता- मौत्कण्ठ्यप्रबलप्रभञ्जनभरैराकर्षितो वर्षति । विज्ञानामृतमद्भुतं निजवचो धाराभिरारादिदं चेतश्चातक चेन्न वाञ्छतिमृषाक्रान्तोऽसि सुप्तोऽसि किम् ॥
नित्यानन्दरूपी अमृत के समुद्र से निकला हुआ और सज्जनों की उत्कण्ठारूप प्रबल वायु से उड़ाकर लाया हुआ सत्वरूप नीलमेघ तेरे पास ही अद्भुत विज्ञानामृत की अपने वचनरूपी धाराओं में वर्षा कर रहा है। अरे चित्तरूपी पपीहे! यदि तुझे उसे पीने की इच्छा नहीं होती तो तुझे व्यर्थ ही किसी ने पकड़ रक्खा है, या तू सो गया है?
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