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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 20
लोकाधीशे त्वयीशे किमिति भवभवा वेदना स्वाश्रितानां संकोचः पङ्कजानां किमिह समुदिते मण्डले चण्डरश्मेः । भोगः पूर्वार्जितानां भवति भुवि नृणां कर्मणां चेदवश्यं तन्मे दृष्टैर्नृपुष्टैर्ननु दनुजनृपैरूर्जितं निर्जितं ते ॥
आप लोकाधीश स्वामी के रहते हुए आपके आश्रितों को संसारजन्य क्लेश क्यों उठाना पड़ता है? क्या सूर्यमण्डल के उदय होने पर भी कमल कभी मुरझाते हैं? यदि कहो कि संसार में मनुष्यों को अपने पूर्वकृत कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है, तो मनुष्यों के मांस से पुष्ट हुए उन मेरे जाने हुए दैत्यराजों ने अवश्य आपके बल को जीत लिया था।
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