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प्रबोधसुधाकर • अध्याय 19 • श्लोक 25
आश्रितमात्रं पुरुषं स्वाभिमुखं कर्षति श्रीशः । लोहमपि चुम्बकाश्मा संमुखमात्रं जडं यद्वत् ॥
भगवान् श्रीर्पात अपने आश्रितमात्र पुरुष को अपनी ओर इस प्रकार खींच लेते हैं जैसे सामने आये हुए जड लोहे को चुम्बक खींच लेता है।
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